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दिल पे इक कुहरा जो छाया था वो छंट रहा है अब
याद तो आती है लेकिन दर्द घट रहा है अब.

थे नहीं थकते कभी हम कर बयाँ ये हाल-ए-दिल,
याद भी करने से उनको दिल झिझक रहा है अब.

रूक न पायेंगे कि हैं मज़बूर वो भी क्या करें,
छोड़ दे जाने दे उनको क्यूँ लिपट रहा है अब.

लौट आया है तू घर को बाद मुद्दत के “अशोक”
था भटकता चारसू वो मन सिमट रहा है अब.

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