Dastuur Hai

है सिकंदर या सुलेमाँ, ईसा या मंसूर है
हर कोई अपनी जगह हालात से मजबूर है

मुन्तज़िर अशआर हैं बस तेरे तब्सिरा के,
तारीफ़ न कर पाए तो तनक़ीद भी मंज़ूर है.

हैं मुहाफ़िज़ हर घडी उस हादिसे के बाद से,
दिल हमारा यूँ तो अब दर्द ओ अलम से दूर है.

हो गए गुम गर्दिश-ए-दौराँ में यूँ तो चंद लोग,
बज़्म-ए-दिल यादों से ताहम आज भी पुरनूर है.

नफरतें कुबूल हैं और इश्क पर हैं बंदिशें,
वाह री दुनिया अजब तेरा यहाँ दस्तूर है.

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