Imtihaan

दर पे खड़े हैं अज़ल से बा-सब्र हम,
लेंगे कितना तिश्नगी का इम्तिहाँ.

(अज़ल – Time immemorial, बा-सब्र – With patience, तिश्नगी – Thirst)

बस इनायत की नज़र इक चाहिए,
इसके बदले दिल ही लेंगे या कि जाँ.

जब भी उठे मेरे दुआ में हाथ हैं,
दिल ने कहा ज़न्नत नहीं इश्क-ए-बुताँ.

तदबीर हम सारी उमर की क्या करें ,
क्या खबर किस वक़्त हो जाएँ फ़ना .

रगबत रही न अब कोई बहार से ,
हो गया है आशना कहरे-खिजाँ.

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