kaagaz ki kashti

ये मेरी कागज़ की कश्ती,
माँ पिताजी से छुपाकर
फाड़ इक कॉपी का पन्ना,
ताकि वो जाएँ न भन्ना,
है बनाई दिल लगा कर.

मैं मेरी कागज़ की कश्ती,
लेके निकला आज देखो,
ढूंढ कर प्रवाह वाली,
एक बड़ी औ गहरी नाली,
छोड़ दी हौले से देखो.

वो मेरी कागज़ की कश्ती,
देखो बहती जा रही है,
एक अनजाने सफर पे,
एक अनजानी डगर पे,
कैसे चलती जा रही है.

वो मेरी कागज़ की कश्ती,
अथक चलती जायेगी यूँ,
जब तलक मंजिल मिले न,
जब तलक इक गुल खिले न,
बोलो ये रुक पाएगी क्यूँ.

वो मेरी कागज़ की कश्ती,
जायेगी ऐसे नगर को,
साध इसकी होगी पूरी,
आस न होगी अधूरी,
पाएगी एक हमसफ़र को.

हा! मगर ये दृश्य कैसा,
क्या हुआ, ये रुक गई क्यों?
कौन सी बाधा ने रोका,
ये नियति का क्या है धोका,
एक तरफ ये झुक गयी क्यों?

हाय वो कागज़ की कश्ती,
रुक के जल में गल गयी है,
मेरी आशाएं डुबा कर,
एक नश्तर सा चुभा कर,
मोम सी, हा! पिघल गयी है.

और इक कागज़ की कश्ती,
फिर बना क्या पाउँगा मैं?
कौन से ढाढस को ले कर,
फिर से दुस्साहस को ले कर,
उस गली जा पाउँगा मैं?

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