Kaisaa tu paagal hai re man..

Penned this yesterday:

कैसा तू पागल है रे, मन.

निठुर प्रेम की जोत जलाता,
चिर पीड़ा को गले लगाता,
जान बूझ कर नित हठपूर्वक,
विरह अग्नि में ह्रदय दहन.

कैसा तू पागल है रे, मन.

छोड़ गए हैं वो तो मुझको,
मृग-तृष्णा भाती पर तुझको,
आस नहीं तू तज पायेगा,
करता रह अब करुण रुदन.

कैसा तू पागल है रे, मन.

सरल नहीं स्मृतियों को खोना,
हो निश्चिन्त घडी भर सोना,
मैंने तुझे तो समझाया था,
कठिन बहुत यह भार वहन,

कैसा तू पागल है रे, मन.

मत भाग किसी तृष्णा के पीछे,
जाग, न रह यूँ अँखियाँ मीचे,
जा अंतर में, अंतरतम में,
हो शांत किया कर आत्म-मिलन,

कैसा तू पागल है रे, मन.

This entry was posted in Hindi, My Poems. Bookmark the permalink.

2 Responses to Kaisaa tu paagal hai re man..

  1. yogshastri says:

    Jo preet lagee sukh kee dehree
    Wah peer jaga layee gehree
    Bach na paya koi bhee usse
    kar le chahe jitne jatan

    Kaisa tu pagal hai re, man

  2. ashok says:

    Wondeful, thanks.

Leave a Reply