Lagtaa hai..

ये जहाँ बिखरा हुआ सा लगता है,
हर दिल मुझे टूटा हुआ सा लगता है.

जानता हूँ तू कोई है अजनबी,
फिर भी पहचाना हुआ सा लगता है.

दिल को होती है तसल्ली जब कभी,
फिर से तू आया हुआ सा लगता है.

इक झिझक रोके है मेरे पाँव को,
वो भी शरमाया हुआ सा लगता है.

क्यूँ क़रीबी दोस्त होकर भी वो यूँ,
अजनबी फिर से हुआ सा लगता है.

उसकी महफ़िल में हूँ मैं नासाज़ सा,
दिल भी घबराया हुआ सा लगता है.

आज फिर बस इक झलक उनकी दिखी,
दिल ये थर्राया हुआ सा लगता है.

दर्द जब उठता है उसकी याद का,
“अशोक” पगलाया हुआ सा लगता है.

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