Rah nahiN Paataa….

बेरुखी का तेरी दर्द सह नहीं पाता.
क्या करूँ कि तेरे बिन मैं रह नहीं पाता.

चुभता हूँ किसी ख़ार की मानिंद मैं,
पर दोस्तों से दूर रह नहीं पाता.

कोई कमी अलफ़ाज़ की नहीं है मुझे,
जज़्बात फिर भी खुल के कह नहीं पाता.

ग़म से तेरे है मेरा ग़म कहीं कमतर,
कमज़ोर हूँ इसको भी सह नहीं पाता.

मालूम है तुम अपना दर न खोलोगे,
बिन दिए सदा फिर भी मैं रह नहीं पाता.

This entry was posted in Ghazals, My Poems. Bookmark the permalink.

Leave a Reply