The useless

Hui Tzu said to Chuang Tzu:
“All your teaching is centered on what has no use.”

Chuang Tzu replied:
“If you have no appreciation for what has no use,
you cannot begin to talk about what can be used.

“The earth for example, is broad and vast,
But of all this expanse a man uses only a few inches
Upon which he happens to be standing at the time.

“Now suppose you suddenly take away
all that he actually is not using,
so that all around his feet a gulf yawns,
and he stands in the void
with nowhere solid except under each foot,
how long will he be able to use what he is using?

Hui Tzu said:
“It would cease to serve any purpose.”

Chuang Tzu concluded:
“This shows the absolute necessity
of what is supposed to have no use.”.

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kaagaz ki kashti

ये मेरी कागज़ की कश्ती,
माँ पिताजी से छुपाकर
फाड़ इक कॉपी का पन्ना,
ताकि वो जाएँ न भन्ना,
है बनाई दिल लगा कर.

मैं मेरी कागज़ की कश्ती,
लेके निकला आज देखो,
ढूंढ कर प्रवाह वाली,
एक बड़ी औ गहरी नाली,
छोड़ दी हौले से देखो.

वो मेरी कागज़ की कश्ती,
देखो बहती जा रही है,
एक अनजाने सफर पे,
एक अनजानी डगर पे,
कैसे चलती जा रही है.

वो मेरी कागज़ की कश्ती,
अथक चलती जायेगी यूँ,
जब तलक मंजिल मिले न,
जब तलक इक गुल खिले न,
बोलो ये रुक पाएगी क्यूँ.

वो मेरी कागज़ की कश्ती,
जायेगी ऐसे नगर को,
साध इसकी होगी पूरी,
आस न होगी अधूरी,
पाएगी एक हमसफ़र को.

हा! मगर ये दृश्य कैसा,
क्या हुआ, ये रुक गई क्यों?
कौन सी बाधा ने रोका,
ये नियति का क्या है धोका,
एक तरफ ये झुक गयी क्यों?

हाय वो कागज़ की कश्ती,
रुक के जल में गल गयी है,
मेरी आशाएं डुबा कर,
एक नश्तर सा चुभा कर,
मोम सी, हा! पिघल गयी है.

और इक कागज़ की कश्ती,
फिर बना क्या पाउँगा मैं?
कौन से ढाढस को ले कर,
फिर से दुस्साहस को ले कर,
उस गली जा पाउँगा मैं?

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raat aadhi..

A lovely poem by my favourite poet, Harivansh Rai Bachchan:

रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने।
फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में और चारों ओर दुनिया सो रही थी,
तारिकाएँ ही गगन की जानती हैं जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी,
मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे अधजगा-सा और अधसोया हुआ सा,

रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने।

एक बिजली छू गई, सहसा जगा मैं, कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में,
इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसू बह रहे थे इस नयन से उस नयन में,
मैं लगा दूँ आग इस संसार में है प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ, कातर,
जानती हो, उस समय क्या कर गुज़रने के लिए था कर दिया तैयार तुमने!

रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने।

प्रात ही की ओर को है रात चलती औ’ उजाले में अंधेरा डूब जाता,
मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी, खूबियों के साथ परदे को उठाता,
एक चेहरा-सा लगा तुमने लिया था, और मैंने था उतारा एक चेहरा,
वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने पर ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने।

रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने।

और उतने फ़ासले पर आज तक सौ यत्न करके भी न आये फिर कभी हम,
फिर न आया वक्त वैसा, फिर न मौका उस तरह का, फिर न लौटा चाँद निर्मम,
और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ, क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं–
बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जो रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने।

रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था ‘प्यार’ तुमने।

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you still love me?

A poem I wrote a few days back. It is still in a very raw form, totally unpolished, but waiting for some opportune moment to get polished:

Do you still love me,
is the question that torments
my heart and soul
day and night.

Do you still love me,
is the question I ask
all the time,
not to you but myself.

Do you still love me?
I know the answer
but can’t let go
that tiny bit of hope.

Do you still love me?
Don’t say you never did,
cause I know what you felt
for me eons ago.

Do you still love me?
I know you don’t any more,
but if you could tell me you once did,
I would rest in peace.

Do you still love me?
Remember how you thought of me
all the time,
in the past?

You have moved on,
but I’m stuck,
waiting still
for your comeback.

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Duniya kare sawal..

Watch it on youtube.

Lovely song written by Sahir Ludhiyanavi, and sung by Lata Mangeshkar.

दुनिया करे सवाल तो हम क्या ज़वाब दें,
तुमको नहीं खयाल तो हम क्या ज़वाब दें.

पूछे कोई कि दिल को कहाँ छोड़ आये हैं,
किस किस से अपना रिश्ता-ए-जाँ तोड़ आये हैं,
मुश्किल हो अर्ज़-ए-हाल, तो हम क्या ज़वाब दें

पूछे कोई कि दर्द-ए-वफ़ा कौन दे गया,
रातों को जागने की सज़ा कौन दे गया,
कहने पे हो मलाल, तो हम क्या ज़वाब दें

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Kabhi kabhi mere dil me khayaal aataa hai…

Sahir Saheb and Amrita Preetam, two great writers, loved each other with some rare intensity. Many of their writings came from their feelings for each other. One of such nazms I like very much:

(Saahir Ludhiyaanavi)

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है
तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी

(शादाब = हरी भरी, delightful;
तीरगी – Darkness; ज़ीस्त – Life, शुआओं – Lights)

अजब न था के मैं बेगाना-ए-अलम रह कर
तेरे जमाल की रानाईयों में खो रहता
तेरा गुदाज़ बदन तेरी नीमबाज़ आँखें
इन्हीं हसीन फ़सानों में महव हो रहता

(बेगाना-ए-अलम = stranger to the world,
जमाल = beauty, रानाईयों = elegance,
नीमबाज़ = half open, महव = drowned, engrossed)

पुकारतीं मुझे जब तल्ख़ियाँ ज़माने की
तेरे लबों से हलावट के घूँट पी लेता
हयात चीखती फिरती बरहना-सर, और मैं
घनेरी ज़ुल्फ़ों के साये में छुप के जी लेता

(तल्ख़ियाँ = bitterness, हलावट = sweetness,
हयात = Life, बरहना-सर = with naked head)

मगर ये हो न सका और अब ये आलम है
कि तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्तजू भी नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िन्दगी जैसे
इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं

ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले
गुज़र रहा हूँ कुछ अनजानी रह्गुज़ारों से
महीब साये मेरी सम्त बढ़ते आते हैं
हयात-ओ-मौत के पुरहौल ख़ारज़ारों से

(महीब = dreadful, सम्त = towards,
पुरहौल full of deceit, might,
ख़ारज़ारों = places full of thorns)

न कोई जादह-ए-मंज़िल न रौशनी का सुराग़
भटक रही है ख़लाओं में ज़िन्दगी मेरी
इन्हीं ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खोकर
मैं जानता हूँ मेरी हमनफ़स मगर फिर भी

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

(जादह-ए-मंज़िल = path of destination,
ख़लाओं = darknessess,
हमनफ़स – companion,friend)

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Kaabaa sarak aayaa…

Once on a forum, someone posted the second line of a she’r, and requested that the first line be reminded to him by anyone who knew the she’r. The line was:

Waheen Kaba sarak aaya jahan maine jabeen rakh dii.
वहीं काबा सरक आया जहाँ मैंने जबीं रख दी.

I didn’t know the full she’r, so I composed the first line myself and completed the she’r. It goes like this:

Khudi jab kho gaii anvaar-e-ikhlaas-e-ibaadat mein,
Waheen Kaba sarak aaya jahan maine jabeen rakh dii.

खुदी जब खो गई अनवार-ए-इखलास-ए-इबादत में,
वहीं काबा सरक आया जहाँ मैंने जबीं रख दी.

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Maykhaanaa…

ये आ गया हूँ दूर किस वीराने में,
चला था ढूँढने छोटा सा कोई मयखाना

गुजरी है क्या न पूछो सुन न पाओगे,
नहीं आसान दर्द मेरे जितना सह पाना.

मज़ा है दर्द-ए-दिल के साथ हँस के जीने में,
बड़ा आसान है वरना तड़प के मर जाना.

तुम्हे डर है कि तुम हो जाओ न रुसवा लेकिन,
जियेगा कैसे तेरे बिन ये तेरा परवाना.

तुझे मालूम ही नहीं कि तेरी चाहत में,
क्या क्या ज़िल्लतें सहता है तेरा दीवाना.

तुम्हे फिर देखने की इक उम्मीद बाक़ी है
हुआ नहीं है अभी ख़ाक तेरा परवाना

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Restlessness….

The inevitable happened on the night of 23rd. Babuji, as we siblings used to call our father, left for heavenly abode. The misfortune of discovering it befell on my shoulders. I will never forget the moments on the morning of 24th, when I discovered that he had left us permanently. He had been a source of strength to me whenever I needed him. Ever since I became aware of my existence, he had been there to guide me whenever I approached him. Parents are like a permanent feature in your existence till you lose them, and it is devastating to lose them.

During the last two weeks or so, since the passing away of my father, I have contemplated a lot. The option of leaving everything behind, to venture into a totally unplanned and uncharted course of life, and to live like the vagabond I have always been lures me very strongly these days.

I have always been a vagabond deep inside. I have fantasized often about leaving everything behind, and seeking out a new, unknown kind of existence; to try and see what plunging myself consciously into the unknown brings to me. Unfortunately, I have a free spirit caged into a timid body. I have been a rebel ever since my childhood, but never had the audacity to take my rebelliousness to its culmination.

The restlessness I feel within has become intolerable. The need to rediscover myself has turned into a crisis. I feel like giving it all up, and go live somewhere no one would know me. The current state of mine is not solely due to the demise of my father. I have already been raw for some time. Something came, filled me with heavenly pleasure, soaked my being with a warmth unimaginable, and then suddenly left leaving me poorer and weaker than I was before. The death only struck probably the final nail.

No matter what I do or don’t do in the future, I would never be the same as before. Something fundamental has changed within myself. The background was there, the preparation was there, and finally it has happened.

Within the next year or two, my life is surely going to take some unforeseen turn.

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koi dost hai na raqeeb hai


कोई दोस्त है न रक़ीब है,

तेरा शहर कितना अजीब है.

वो जो इश्क था वो जूनून था,
ये जो हिज्र है वो नसीब है.

मैं किसे कहूँ मेरे साथ चल,
यहाँ सबके सर पे सलीब है.

यहाँ किसका चेहरा पढ़ा करूँ,
यहाँ कौन इतना करीब है.

तुझे देख कर मैं हूँ सोचता,
तू हबीब है या रक़ीब है.

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