Kabhi kabhi mere dil me khayaal aataa hai…

Sahir Saheb and Amrita Preetam, two great writers, loved each other with some rare intensity. Many of their writings came from their feelings for each other. One of such nazms I like very much:

(Saahir Ludhiyaanavi)

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है
तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी

(शादाब = हरी भरी, delightful;
तीरगी – Darkness; ज़ीस्त – Life, शुआओं – Lights)

अजब न था के मैं बेगाना-ए-अलम रह कर
तेरे जमाल की रानाईयों में खो रहता
तेरा गुदाज़ बदन तेरी नीमबाज़ आँखें
इन्हीं हसीन फ़सानों में महव हो रहता

(बेगाना-ए-अलम = stranger to the world,
जमाल = beauty, रानाईयों = elegance,
नीमबाज़ = half open, महव = drowned, engrossed)

पुकारतीं मुझे जब तल्ख़ियाँ ज़माने की
तेरे लबों से हलावट के घूँट पी लेता
हयात चीखती फिरती बरहना-सर, और मैं
घनेरी ज़ुल्फ़ों के साये में छुप के जी लेता

(तल्ख़ियाँ = bitterness, हलावट = sweetness,
हयात = Life, बरहना-सर = with naked head)

मगर ये हो न सका और अब ये आलम है
कि तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्तजू भी नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िन्दगी जैसे
इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं

ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले
गुज़र रहा हूँ कुछ अनजानी रह्गुज़ारों से
महीब साये मेरी सम्त बढ़ते आते हैं
हयात-ओ-मौत के पुरहौल ख़ारज़ारों से

(महीब = dreadful, सम्त = towards,
पुरहौल full of deceit, might,
ख़ारज़ारों = places full of thorns)

न कोई जादह-ए-मंज़िल न रौशनी का सुराग़
भटक रही है ख़लाओं में ज़िन्दगी मेरी
इन्हीं ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खोकर
मैं जानता हूँ मेरी हमनफ़स मगर फिर भी

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

(जादह-ए-मंज़िल = path of destination,
ख़लाओं = darknessess,
हमनफ़स – companion,friend)

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